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Aryabhata

Indian Mathematician-Aryabhata was born in Kushukpura in 476 A.D. Aryabhata compased the book "Aryabhata" in the year 499 A.D. at the age of 23. This book has four major parts:

1. Gitika Pad 2. Ganit Pad 3. Kaalkirya Pad 4. Goal Pad

There are 13 verses (Shalokas) in Gitika pad, 33 verses in Ganit Pad, 25 Verses in Kaalkriya pad and 50 verses in Goal pad. Thus there are 121 verses in the Aryabhateeyam.

The topics given in Aryabhata's Ganit Pad are as follows: Place value system square and cube, Parikaram (Round about ) Square red, Cube root, triangle, area of circle and trapizium, volume of sphere and pyramid, value of pi) R- sine table roagressum mathematics (Ap and Gp) Fifth Rashik sapt rashik, Viprit | karam (opposite order) quadrate equation. Indeterminate Equation..

Bhaskar I (629 A.D) has written a treaty on Aryabhata. This text is very famous. Aryabhata's contribution in incomparable. Some points of important points are being mentioned here.





The alphanumeric system of expressing numbers is the fundamental discovery of Aryabhata. Aryabhata has given the rules of third variable, fifth variables, and seventh variable. he is the first mathematician to give these type of rules. Value of Pi (TT) According to Aryabhatta चतुरधिकम्शतमष्टगुणम्द्वाषधष्टस्तथा सहस्राणाम।् अयतुद्वय धिष्कम्भस्यासन्नो ित्तृ पररपाहः ।। 10 ।। Meaning: by adding 4 into 100 and multiply it by 8 and add 62000 in it. This total sum will be approximately the measurement of the circumference of the circle of 20000 diameter. That is, the circumference of the circle of 20,000 diameter will be approximately 62832. Pi(π) = Circumference/Diameter Π = 62832/20000 (approximate) Thus according to him Pi (Π) = 3.1416 (approximate) which is still considered true to 4 decimal places. Aryabhaπa is the first mathematician finite value of the ration of circumference and diameter i.e.pi (Π).

Aryabhatta was the first mathematician who gave the method to solve the indeterminate equations (ax+by+c) where all numbers are integers. He gave the R-sine table to reach from 0 to 90°. He is the first mathematician to give this values given in this table is remarkable. He is the inventor of Trigonometry. In the geometry, the area of the triangle and many theories related to chord and diameter are given by him. He is the first astronomer to say that the earth is round. The planets do not have their own light, the part which comes in front of the sun shines only.. This information is given by Aryabhatta.

The Sun is stable and the earth and other planets relates around the Sun.It is said by Aryabhatta. Aryabhatta has clarified the causes of solar and Lunar eclipse. छादयधत शशी सयूयशधशनं महती च भच्ूछाया ॥37॥ The work of Aryabhatta. proved to be a guide for his successors. Aryabhatta fame is not only confirmed to India but he is also well known in foreign countries. Being a great astronomer and mathematician the arabs used to call him "Araj Bhar". To honour him for his great contribution. India launched its first satellite on April19, 1975 into the space and named it after him as 'Aryabhata'.


भारतीर् गणितज्ञ आर्यभट प्रर्म आर्भय ट का जन्म 476 ई. में कुसुमपुर में हुआ था। कुसुमपुर को बाद में पाटलिपुत्र कहा गर्ा हैऔर वर्मय ान में र्ह बबहार की राजधानी पटना है। र्ह समर् भारर् का स्वर्य र्ुग था। इस समर् सम्पूर्य भारर् मगध शासक के ननदेशन में चहुुंमुखी प्रगनर् कर रहा था। इसी काि में आर्भय ट ने 23 वर्य की आर्ुमें सन् 499 ई. में आर्भय टीर् नामक ग्रुंथ की रचना की। इस ग्रन्थ के चार प्रमुख भाग हैं:- 1. गीनर्का पाद 2. गणर्र् पाद 3. कािक्रिर्ा पाद 4. गोि पाद। गीनर्का पाद में 13 श्िोक, गणर्र् पाद में 33 श्िोक, कािक्रिर्ा पाद में 25 श्िोक र्था गोि पाद में 50 श्िोक हैं। इस प्रकार आर्यभटीर् ग्रन्थ में 121 श्िोक हैं। आर्यभटीर् के गणर्र् पाद में जो ववर्र् ददर्े हैं वे इस प्रकार हैं: सुंख्र्ा स्थान ननरूपर्, वगय और घन, पररकमय, वगमय ूि, घनमूि, बत्रभुज, वर्ृ और समिम्ब चर्ुभुजय के क्षेत्रफि र्था गोि और वपरालमड का आर्र्न र्था का मान R-Sin सारर्ी, श्रेढी गणर्र्म, ्त्रैरालशक, व्र्स्र् त्रैरालशक, पुंचरालशक, सप्र्रालशक, ववपरीर् कमय, र्ुगपर् समीकरर्, कुट्टक। आर्यभटीर् पर भास्कर प्रथम (629 ई०) ने भाष्र् लिखा है। र्ह भाष्र् बहुर् प्रलसद्ध है। आर्भय ट का र्ोगदान अर्ुिनीर् है। महत्वपूर्य बबन्दओं ु ुं में से कुब बबन्दओं ु ुं का ्लेिेख र्हा क्रकर्ा जा रहा है। 1. सुंख्र्ाओं ुं को व्र्क्र् करने की वर्ाांक प्रर्ािी आर्यभट की मौलिक खोज है। 2. त्रैरालशक, पुंचरालशक, सप्र्रालशक के ननर्म आर्यभट ने ददर्े हैं। इस प्रकार के ननर्म देने वािे वे प्रथम गणर्र्ज्ञ हैं। 3. पाई का मान आर्यभट के अनुसार चर्ुरधधकम ्शर्मष्टगुर्म ्द्वार्ष्ष्टस्र्था सहस्रार्ाम।् अर्ुर्द्वर् ववष्कम्भस्र्ासन्नो वत्तृ पररपाहः ।। 10 ।। अथय : सौ में चार जोड़कर ्से 8 सेगुर्ा करें और इसमें 62,000 जोड़ें। र्ह र्ोगफि 20,000 व्र्ास के वत्तृ की पररधध का िगभग माप होगा। अथायर््20,000 व्र्ास के वत्तृ की पररधध िगभग 62,832 होगी। पाई (7) पररधध / व्र्ास =62832 20000 िगभग इस प्रकार ्नके अनुसार पाई (Π) 3.1416 िगभग, जो दशमिव के 4 स्थानों र्क आज भी सही है। आर्भय ट पहिेगणर्र्ज्ञ हैंष्जन्होंने पररधध और व्र्ास के अनुपार् अथायर््(Π) पाई का िगभग पररलमर् मान ज्ञार् क्रकर्ा था। 4. कुट्टक (ax+by+c जहा सभी सुंख्र्ाएुं पूर्ाांक हैं) इस प्रकार के समीकरर् हि करने की ववधध देने वािे आर्यभट प्रथम गणर्र्ज्ञ थे। 5. R sine सारर्ी 0° से 90° र्क पहु चने र्क ्न्होंने दी है। इस प्रकार की सारर्ी देने वािे वे प्रथम गणर्र्ज्ञ हैं। इस सारर्ी में ददर्े गर्े मानों की शुद्धर्ा ्लेिेखनीर् है। वे बत्रकोर्लमनर् के आववष्कर्ाय हैं।. 6. ज्र्ालमनर् में बत्रभुज का क्षेत्रफि र्था जीवा और व्र्ास से सम्बष्न्धर् अनेक लसद्धाुंर् ्न्होंने ददर्े हैं। 7. पथ्ृवी गोि हैऐसा कहने वािे वे प्रथम खगोिशास्त्री हैं। 8. ग्रह स्वर्ुं प्रकालशर् नहीुं है। ्नका जो भाग सर्ू य के सामने आर्ा है ्सी में प्रकाश रहर्ा हैर्ह जानकारी आर्यभट ने दी। 9. सूर्य ष्स्थर हैर्था पथ्ृवी आदद ग्रह सूर्य की पररिमा करर्े हैंर्ह बार् आर्भय ट ने बर्ाई है। 10. आर्भय ट ने सूर्ग्रय हर् और चन्रगहर् के कारर्ों को स्पष्ट क्रकर्ा है। बादर्नर् शशी सूर्य शलशनुं महर्ी च भूच्बार्ा ॥37॥ आर्भय ट का कार्य परवर्ी गणर्र्ज्ञों के लिए मागदय शकय लसद्ध हुआ। आर्भय ट की प्रलसद्धध भारर् में ही नहीुं अवपर्ु ववदेशों में भी है। महान खगोिशास्त्री एवुं गणर्र्ज्ञ होने के कारर् अरब वासी इन्हें " अरज भर" नाम से पुकारर्े थे। भारर् ने 19 अप्रैि 1975 को अन्र्ररक्ष में अपना पहिा ्पग्रह बोड़ा ्सका नाम आर्यभट रख कर आर्यभट के र्ोगदान के प्रनर् सम्मान प्रकट क्रकर्ा है

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